Prerna Magazine December 2009 Edition
previous editions
 
      Prerna Magazine // August 2010 Edition
आलेख
 
Prerna Magazine December 2009 Edition
 
हिन्दी गजल संवेदनात्मक बदलाव की ओर
अनिरुद्ध सिन्हा

यह दावा नहीं बल्कि दावा करने की कोशिश है हम हालात के विरूद्घ हैं। तमाम प्रवचन करनेवाले झूठे लोगों के खिलाफ हैं। हमने समय की अतल गहराई में जाकर पत्थरों पर गीत लिखा है। बेबस और दुखी आदमी का गीत। प्रेमचंद्र और दुष्यंत कुमार की तरह ही हम अंधेरे और बियावान में जाग रहे हैं।

गैर जरूरी रूपपाद के अराजक हमलों के बीच भी समकालीन हिन्दी गजल में यथार्थवादी चेतना का उदय स्पष्टï रूप में देखा जा सकता है। आज की गजलें विश्वस्त तरीके से अपने समय में प्रवेश करती है। जीवन के एकाकी पक्ष को उजागर नहीं करती। अपितु जीवन के अखंड स्वरूप को अपने में समाये चलती है । सौंदर्यवादी होती हुई भी जनवादी है।

लेकिन यह दुखद है कि हिन्दी साहित्य में यह किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच पाई है। आधुनिक भावबोध के साथ अपनी अस्मिता की तलाश कर रही है। ऐसा इसलिए हो रहा है कि अभी पूरा का पूरा हिन्दी काव्य संक्रमण काल से गुजर रहा है। यह संक्रमण बदलाव का संकेत है। हाशिये पर कर दिए छंदों की वापसी का संकेत है। भारत की मिश्रित संस्कृति में छंदों की अनिवार्यता को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। निराला के माध्यम से हिन्दी कविता में जो परिवर्तन हुआ था उसका व्यापक असर पाठकों पर नहीं देखा गया धीरे धीरे हिन्दी कविता में संदेह की परिस्थिति उत्पन्न हो गयी। पाठक विभाजित होने लगे। बावजूद इसके हिन्दी कविता अपनी विपरीत राह तय करके चलती रही। उसका अंतर्मन, उसका बाह्यï संसार और उसका लोकजीवन पाठकीय उदासीनता के कारण गांर्भीय और पाठकीय संस्कार की कसौटी तक नहीं आ सके। हिन्दी कविता में अपने तरह का यह लेखन अपनी ही सीमाओं में सिमटकर रह गया। परंतु दुष्यंत कुमार ने आत्म केंद्रित कविता के विरूद्ध एक नई राह तैयार की। पाठक की आंखों में नवीन सपनों का संसार निर्मित किया। गजल के माध्यम से हिन्दी काव्य को गरिमा प्रदान की। इन्होंने अलौकिक कविताओं के विरूद्ध लौकिक गजलों का सृजन किया। यहां पर मैं यह स्पष्टï कर देना चाहता हूं कि दुष्यंत कुमार हिन्दी गजल के प्रथम गजलकार नहीं है। हां भले इनके माध्यम से हिन्दी गजल को नयी जमीन और नयी पहचान मिली है।

दुष्यंत कुमार अपने समय के यथार्थवादी सच लेकर पाठकों के समक्ष उपस्थित हुए। सही यथार्थ का उद्ïघाटन ही उनका प्रथम लक्ष्य था। राजसत्ता का विरोध और आम जनता की पीड़ा उनकी गजलें का प्रमुख स्वर बनी। उन्होंने अपनी गजलों के माध्यम से जो भी कहा सामूहिक स्वर को सामने रखकर कहा। जादुई यथार्थ की दुकान खोलकर साहित्य की सौदेबाजी का आरोप नहीं लगा।

एक भयावह परिवेश के आगोश में जब मानवीय संवदेना छटपटाती है तब आसपास की साहित्यिक प्रवृत्तियां सिर उठाने लगती हैं। समाज और संस्कृति की रक्षा के लिए विचारधाराओं का जन्म होता है। मानसिकता और साहित्य का वातावरण गर्म होने लगता है। मानसिकता और वैचारिक प्रतिबद्घता की कसौटी पर साहित्य को कसा जाना आरंभ हो जाता है। साहित्य का मुख्य प्रयोजन मूलत: विरोध ही होता है। लेकिन यह भी गौर करने वाली बात है कि साहित्य का विरोध मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता। इसका एक उदाहरण हैं दुष्यंत कुमार की गजलें। इनकी रागात्मक अनुभूति या अपनी सीमा का अतिक्रमण नहीं करती चाहे वह राजनीतिक या सामाजिक विद्रूपताओं का विरोध हो। लोक जीवन की मिठास और कहन का धैर्य बचा हुआ हैै। दुष्यंत कुमार का लेखकीय दायित्व सामाजिक दायित्व के साथ साथ चलता है। इस शेर में दुष्यंत कुमार की सामाजिक पीड़ा में मैं शामिल है:- ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दोहरा हुआ होगा, मैं सजदे में नहीं था आपको धोखा हुआ होगा।

दुष्यंत कुमार की गजलों में भाषिक सरलता तो है ही साथ ही भाषाई समझ का एक बड़ा कैनवास भी है। भारत की मिश्रित संस्कृति में भाषा की अनुशासति प्रतिबद्घता रचना को लोकप्रिय होने से रोकती है। यह दुष्यंत कुमार का ही प्रभाव है कि आज हिन्दी और उर्दू काफी करीब आ गई है। समकालीन साहित्य पर इसका असर साफ-साफ देखा जा रहा है। हालांकि यह समझ प्रेमचंद के जमाने में ही विकसित होने लगी थी लेकिन दुर्भाग्य से प्रेमचंद हिन्दी और उर्दू के दो हिस्सों में बंट गए। आज की सच्चाईयां, चेतना तथा लोकरंग उभरकर सामने आए हैं। भाषायी समन्वय की जमीन तैयार करनेवालों शायरों की सूची लंबी भी हो सकती है। लेकिन यहां पर निदा फाजली, बशीर बदू, कृष्ण बिहारी नूर, शहरयार, शकील अहमद मोईन जैसे नामी गिरामी शायरों का नामोल्लेख करना आवश्यक हो जाता है। इनकी अधिकांश गजलों की भाषा उर्दू में प्रयोगशीलता को एक नया मुकाम देती है। भाषायी चिंतन की यह रचनात्मक बारीकी इन शेरों में देखी जा सकती हैै:

पहले नहाई आसे में फिर आंसुओं में रात/ यूं बूंद बूंद उतरी हमारे घरों में रात (शहरयार)

उसकी धुन में हर तरफ भागा किया दौड़ा किया/ एक बूंद अमृत की खातिर मैं समंदर पी गया (कृष्ण बिहारी नूर)

तितली ने गुल को चूम के दुल्हन बना दिया/ऐ इश्क तूने सोने को कुंदन बना दिया। (मुनव्वर राना)

मेरी रातों कुछ निशानी दे/ शुब्क आंखों में थोड़ा पानी दे/ शब्द आंखों में हो गए ओझल/ कुछ किताबें हमें पुरानी दे (शकील अहमद मोईन)

गजल केवल उर्दू भाषा भाषियों के लिए ही नहीं अपितु हिन्दी साहित्य के लिए भी आधुनिक हैै। समकालीन हिन्दी गजल मनुष्य को उस लक्ष्य के लिए कर्म करने को प्रेरित करती है, जिसे वह प्राप्त नहीं कर सका पर जिसकी कल्पना, जिसका सपना वर्तमान की वास्तविकता में कहीं अधिक मूल्यवान है, उसके लिए यथार्थ में प्रतिकूल, गजल का सत्य उसके भीतर समाहित तथ्यों की समष्टिï नहीं समाज में उसकी गत्यात्मक भूमिका है उसकी सामूहिक संवेग को उद्घीप्त करने की क्षमता है। ऐसे भी साहित्य की सार्थकता तभी है जब उसकी रचना अत्यंत व्यक्तित्व जीवन से प्रारंभ होकर समाज, इतिहास और विश्व के भरे पूरे संसार को अपने में समाहित कर ले। आज राजनीतिक और सामाजिक परिवेश में फैैले पूंजीवाद, आतंकवाद, भ्रष्टïाचार, राजनीति का अपराधीकरण के नए धु्रवीकरण के निर्माण से हमारे देश का प्रजातांत्रिक ढांचा चरमरा गया हैै। चारों ओर अंधेरा है। इस अंधेरे में बसंत की तलाश साहित्य ही कर सकता हैै। समकालीन हिन्दी गजलों में सुसंगत विश्वदृष्टिï के साथ अपनी अनुभूति और संवेदना के अनुरूप रचनात्मक कल्पना और अद्ïभुत सौंदर्य की गरिमा देखी जा सकती है। यथार्थ स्थितियों के चित्रण के साथ साथ उसके परिप्रेक्ष्य में महत्वपूर्ण सवाल भी उठाए गए हैं। जिसकी धरती चांद तारे आसमां सोचो जरा / उसका मंदिर तुम बनाओगे अमां सोचो जरा बच्चों को मन होता हैै उपजाऊ मिट्ïटी की तरह / बीज क्या बोना है उसमें बागवां सोचो जरा (उदय प्रताप सिंह)

यह सही है कि गजल बात को सीधे और स्पष्टï रूप में न कहकर थोड़ा घुमा फिराकर इशारों और संकेतों में कहना पसंद करती है। सपाटबयानी गजल का प्रतिरोधक तत्व हैै। सपाट बयानी से इसका पाठकीय रूझान नकारात्मक हो जाता है। बावजूद इसके उपरोक्त दोनों शेरों को समझने में एक प्रबुद्घ पाठक को तनिक भी उलझन नहीं होगी। वह समझ जाएगा कि साम्प्रदायिक सद्ïभाव को चोट पहुंचाने वाले बिम्ब क्या हैैं। दोनों शेरों में भरपूर आत्मीयता है। प्रेम की केंद्रीय उपस्थिति को सहेजे उपरोक्त शेरों में उत्तेजक और उन्मादपूर्ण वक्तव्यों को थोड़ी सी भी जगह नहीं मिली है। पूरी गजल की गरिमा के साथ है। यही गजल की विशेषता भी हैै। बड़ी से बड़ी बात कह दी जाए लेकिन सौंदर्य, उत्सुकता, स्वप्र, धीरज और विश्वास का भरोसा बचा रहे।

आज के संघर्षपूर्ण, प्रतिस्पद्र्घापूर्ण और भौतिकवादी विकास के युग में साहित्य सबसे विकट स्थिति में है। आज का पढ़ा लिखा समाज भी भाषा साहित्य और सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलन की दिशा में उदासीन है। उसके अंदर कहीं से भी प्रगतिशील चेतना और रचनात्मक सोच दिखाई नहीं पड़ते। यह एक विचारणीय सवाल है। इसका हल साहित्यकारों को ही करना है। यथार्थवादी ज्ञान को और भी गहराई तथा विस्तार से देखना होगा। सबसे पहले हमें देखना होगा वस्तुगत यथार्थ की साहित्यिक अभिव्यक्ति में व्यक्ति की अपनी सहानुभूति, उसकी विचारधारा का स्थान एवं महत्व क्या है। पाठक की रुचि और अभिरूचि का भी ख्याल करना होगा। हमें देखना होगा हमारी लेखनी देश और काल के चेहरे पर पड़ी हल्की से हल्की शिकन को भी साहित्य में अभिव्यंजित करने में समर्थ होती है या नहींं?

यहां पर मेरा आशय पाठकीय स्वीकृति से हैै। जैसा कि मुक्तछंद कविता के बारे में कहा गया कि यह शिक्षित वर्ग की चीज हैै। परिणाम सामने हैं। धीरे धीरे मुक्त छंद कविता बंद गली में पहुंच गई। उसी बंद गली से एक नयापथ गजल के लिए निकलता है जो गजल के माध्यम से हिन्दी कविता को एक नए उत्कर्ष की ओर ले जाता हैै। पिछले कुछ दिनों से हिन्दी जगत में गजल के प्रति रूझान बढ़ा है। इसके व्याकरण को जानने समझने की जिज्ञासा जाग्रत हुई हैै। इसका प्रमुख कारण है इसका काव्यात्मक स्वभाव जो तुरंत ही पाठकों को अपनी ओर आकर्षित कर लेता हैै। हिन्दी भाषा में वर्तमान पीढ़ी के नए गजलकारों की वर्तमान स्थिति पर नजर डालने के लिए उनके कुछ शेरों को उद्ïधृत करना आवश्यक हो जाता है:-

दोस्तों, जनतंत्र में ये भी अदा पाई गई,/ राजपथ पर सुबह सच की खाल खिंचवाई गई (अशोक अंजुम)

जिंदगी के ये खरीदार कहां थे पहले, /लोग थे लोगों में बाजार कहां थे पहले (अखिलेश तिवारी)

आज के सम्मुख हमारी बस्तियां रखकर गए / कुछ सयाने लोग यूं खुद गर्जियां रखकर गए। (अशोक आलोक)

तुझे अपनी खुशी के रास्ते, खुद ही बनाने हैं,/ अगर तू खुश नहीं है तो बगावत क्यों नहीं करता (अशोक रावत)

नयी राह हमको दिखाने लगे हैं/ लहू जब कभी हम बहाने लगे हैैं (विकास)

भविष्य के प्रति आस्था समकालीन हिन्दी गजल की एक विशेषता हैै। जीवन और जगत के बीच घटनेवाली छोटी-छोटी घटनाओं के बीच खुश रहने का और उज्जवल भविष्य के सपने देखने का प्रयास भी मिलता हैै। संसार की समस्त रचनाशीलता जिस समग्र जीवन की तलाश कर रही हैै। और चुनौती रूप में उसके सामने खड़ी हो रही हैै। समकालीन हिन्दी गजल को भी इसी संदर्भ में जांचना परखना होगा। परिवेश और जीवन की समग्रता की बारीकियों को पकडऩा होगा। यह जाहिर सी बात हैै कि आर्थिक दबाव और परिवर्तित तकनीक के कारण प्रतिमानों और मूल्यों की निरर्थकता सिद्घ हुई हैै। इस भयावह यथार्थ से बचने के लिए कोई विकल्प खोजना पड़ेगा। यह काम साहित्यकार ही करेगा। सिर्फ यथार्थ चित्रण से काम नहीं चलेगा। सामाजिक दशा के साथ-साथ राजनैतिक अवस्था के प्रति भी हिन्दी गजल सतर्क है:

देखिए पत्तों की हरियाली चुराता कौन है,/ टहनियों को इस तरह नंगा बनाता कौन है। (माहेश्वर तिवारी)

समाकालीन हिन्दी गजल सच्चे अर्थों में जीवनधर्मी कहीं जा सकती है। अपनी जड़ों के प्रति एक प्रकार की विकलता देखी जा रही है। अपने वर्तमान और अतीत की पहचान में विवेक सम्मतता का आभास करती है। व्यक्ति, उसका समाज, परिवार, परिवेश, भाव एवं काल सबकुछ उतर आया हैै इसमें। शाम को जिस वक्त खाली हाथ घर जाता हूं मैं, /मुस्कुरा देते हैं बच्चे और मर जाता हूं मैं,/ जिंदगी जब मुझसे मजबूती की रखती है उम्मीद,/ फैसले की उस घड़ी में क्यूं बिखर जाता हूं मैं। (राजेश रेड्ï्ïडी)

राजेश रेड्ïडी आज के सफल गजलकार हैं। इन्होंने काफी करीब से लोकजीवन के यथार्थ को देखा हैै। ये अपने गजलों में निरीक्षण और प्रमाणिकता पर बल देते हैं। अपनी अनुभूतियों, धारणात्मक मूल्यों, दार्शनिक स्थापनाओं और उद्ïबोधनों को साथ लेकर चलते हैं। उपरोक्त दोनों शेरों में यथार्थ चित्रण है जिसमें जीवनाभास और सत्यान्वेषण का आग्रह है। शाम को खाली हाथ घर लौटना यह एक असफल जीवन की गाथा है। ऐसी स्थिति में बच्चे का मुस्कराना पश्चाताप का उत्कर्ष माना जाएगा। आदमी की स्थूल मनोवृतियों का चित्रण हैै। किसी वर्गगत भावना या परिस्थितियों का राग द्वेष नहीं है। सामज को वास्तविक रूप में देखने की कोशिश है। या हम यह भी कह सकते हैं कि संपूर्ण जीवन और मानव उल्लास से कटे हुए पंथ का मर्सिया हैै। चल खला में कहीं रहा जाए,/ चुप कहा जाए चुप सुना जाए। /पांव धरती पे टिके हो अपने, /यूं फलक को कभी छुआ जाए (धु्रव गुप्त)

हिन्दी की प्रगतिशील यथार्थवादी काव्यधारा को आगे विकसित करने वाले गजलकारों में ध्रुवगुप्त अत्यंत महत्वपूर्ण गजलकार हैैं। जिन्हें आधार मानकर प्रगतिशील गजल का नया सौंदर्यशस्त्र बनाने में सबसे अधिक ऊर्जा मिल सकती हैै। धु्रवगुप्त सच्चे अर्थों में जीवनहामी गजलकार हैैं। इनकी जीवनधर्मिता प्रगतिशील गजल का मुख्य आधार है। केवल आशा विश्वास आस्था की स्वीकृति में हैन्।इस जीनधर्मिता को नहीं पहचानते। कठिन निराशा और अंधकार में ही जीवनधर्मी लगाव छुपे नहीं रहते। व्यापक अर्थ में जीवनधर्मी काव्यत्व में प्रेम, मानवीय करूणा, संघर्ष, उत्साह आवेग, जीवन कर्म, सौंदर्य की पहचान, साहस, प्रकृति से लगाव, समय की चेतना, इतिहास बोध, वर्ग चेतना, जनपक्षधरता आदि के साथ वह विश्वदृष्टिï भी निहित है जो समाज के क्रांतिकारी बदलाव के प्रति प्रेरणा होती है। जिस प्रकार दुष्यंत कुमार की गजलों में जीवन धारा की अनिवार्य स्वीकृति है उसी प्रकार धु्रव गुप्त की गजलों में भी जीवनयात्रा जारी हैै।

यहां पर मैं एक गैर जरूरी प्रश्न का उल्लेख कर देना आवश्यक समझता हूं। प्रश्न है हिन्दी समीक्षकों का। हिन्दी समीक्षकों के द्वारा बार बार यह सवाल उठाया जाता हैै। गजल हिन्दी की विधा नहीं है। प्रश्र यहां पर यह है कि ऐसी परिभाषा की आवश्यकता क्या हैै। विधा चाहे हिन्दी की हो या किसी अन्य भाषा की हो, मुख्य बात तो यह हैै कि इसमें भाव होने चाहिए, उससे रस निष्पत्ति होनी चाहिए। उससे आनंद मिलना चाहिए। भाषा का विवाद छेड़ा ही क्यों जाए। धीरे धीरे हिन्दी साहित्य की परिधि विस्तृत हुई है। इसमें नए नए विषयों का समावेश हुआहै, व्यंजना की नई पद्घतियां विकसित हुई हैं। मनुष्य के स्वभाव में बदलाव के साथ ही साहित्य में भी बदलाव आता है। विधा के नाम पर हिन्दी गजल को सीमित अर्थ में लेना अनुचित है।

हिन्दी गजल की लोकपिय्रता का प्रमुख कारण है आदमी का रसबोध।यह जाहिर है कि आदमी का रसबोध परिवर्तनशील होता हैै। यह साहित्य का सशक्त दृष्टिकोण है। हर काल में साहित्य का मूल्यांकन इसी कसौटी पर हुआ है। गजल हिन्दी साहित्य का रचनात्मक रूपांतर है। छंदों के साथ तादात्म्य स्थापित करने का जरिया हैै। हिन्दी समीक्षक गजल के विरूद्घ अपनी घोषणा को संभावित यथार्थ के समक्ष रखने की भूल कर रहे हैैं। उनकी घोषणा कुछ ही समय में छिन्न-भिन्न हो जाएगी।

हिन्दी गजल आधुनिक युग की देन हैै। गजल के प्रति असाधारण रूचि उत्पन्न हुई हैै। आज बड़ी संख्या में गजलें लिखी जा रही हैं। हिन्दी में गजल की स्थापना के लिए शुभ हैै। हिन्दी भाषियों को गजल जैसी नाजुक विधा मातृभाषा की तरह अपनानी होगी। साथ ही बौद्घिक यथार्थ से बचते हुए वास्तविक जीवन के चित्रों को पकडऩा होगा। अगर ऐसा नहीं होगा तो सामाजिक संघर्ष के चित्रण का सवाल कहां से उठेगा।

प्रसंगवश यहा यह भी उल्लेखनीय है कि आज गजल में जो निजता की प्रतिस्थापना हुई हैै उसमें दुष्यंत कुमार के बाद सबसे अधिक योगदान हमारे वरिष्ठï गजलकारों ने दिया है। इस परंपरा में सूर्यभान गुप्त, गिरिराजशरण अग्रवाल, उदभ्रांत, जहीर, कुरैशी, प्रेम किरण, सुल्तान अहमद की गजलें विशेष उल्लेखनीय है जिनमें कश्यप के निर्वाह के साथ साथ काव्यशास्त्र का भी निर्वाह मिलता हैै। फिलहाल हिन्दी समीक्षकों कवियों से निवेदन हैै कि हिन्दी गजल को उर्दू गजल के समक्ष खड़ा करने की कोशिश न करें।

सम्पर्क : गुलजार पोख, मुंगेर (बिहार) 811201, मो.-09430450098


 
अमिताभ मिश्र कविता का पाठ, पाठ की कविता
अनिरुद्ध सिन्हा हिन्दी गजल संवेदनात्मक बदलाव की ओर
भगवत रावत समकालीन हिन्दी कविता का स्वरुप और संरचना
कमल किशोर गोयनका लम्बी कविता पर एक बहस
श्री प्रकाश मिश्र नक्सलवादी कविता: दूसरा दौर
डॉ. सुरेन्द्र वर्मा आज की कविता-कुछ टिप्पणियाँ
उदयभानु हंस हिन्दी गज़ल की भाषा
डॉं वीरेन्द्र सिंह समकालीन गीत की संरचना में विज्ञान बोध के आयाम
 
 
पंजीयन - आर.एन.आई.एम.पी./एच.आई. एन/13963/12/1/98/टी.सी.
go to top
अपनी बात || आपकी कलम से || विमर्श || बहस के लिए || आलेख || चिंतन || कविता || गीत || गज़ल || कला || फिल्म || रपट || पुस्तक चर्चा || लघु/छोटी/साहित्यिक पत्रिकाओं के कुछ अंक || रचना क्रम
Prerna Magazine // August 2010 Edition // Contact Us // Feedback // Sitemap  
Previous EDITIONS == Dec 2006 // Sep 2007 // June 2008 // June 2009 // Dec 2009